Premanand ji Maharaj : क्या नाम जप का फल इसी जन्म में मिलेगा? महाराज ने जो जवाब दिया, वह सुनकर मन शांत हो जाता है

प्रेमानंद जी महाराज से पूछा गया – नाम जप का फल अगले जन्म में मिलेगा या इसी जन्म में? महाराज जी ने जो जवाब दिया वह सुनकर रोम-रोम आनंद से भर जाएगा। प्रारब्ध, संचित कर्म और नाम जप की महिमा। जय श्री राधे!

Dec 1, 2025 - 12:24
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Premanand ji Maharaj : क्या नाम जप का फल इसी जन्म में मिलेगा? महाराज ने जो जवाब दिया, वह सुनकर मन शांत हो जाता है
Premanand ji Maharaj : क्या नाम जप का फल इसी जन्म में मिलेगा? महाराज ने जो जवाब दिया, वह सुनकर मन शांत हो जाता है

Premanand ji Maharaj : हमारे शास्त्रों में बार-बार कहा गया है कि कर्म ही मनुष्य के भाग्य का लेखक है। जो हम आज करते हैं, उसका फल कल मिलता है; कभी इसी जन्म में, कभी अगले जन्म में। पिछले जन्मों के कर्म इस जन्म को बनाते हैं और इस जन्म के कर्म अगले जन्म की नींव रखते हैं। इसी कारण कभी-कभी देखते हैं कि कोई व्यक्ति बिना विशेष प्रयास के ही सुख-समृद्धि पा लेता है, जबकि कोई मेहनत करने के बाद भी दुखों से घिरा रहता है। लोग कहते हैं, “पिछले जन्म के पुण्य होंगे” या “पिछले जन्म के पाप भोग रहा होगा।” यह बात सौ फीसदी सत्य है।

लेकिन एक सवाल अचूक उपाय भी हमारे शास्त्रों ने बताया है जो न केवल पिछले जन्मों के पापों को जला देता है, बल्कि इस जन्म में किए जा रहे संचित कर्मों को भी भस्म कर देता है। वह उपाय है – श्री राधा-कृष्ण नाम का निरंतर जप।

वृंदावन में विराजमान परम पूज्य श्री प्रेमानंद जी महाराज से एक बार एक महिला भक्त ने बड़ी व्याकुलता से प्रश्न किया :

“महाराज जी, मैं रोज़ नाम जप करती हूँ, माला फेरती हूँ, लेकिन जीवन में दुख कम होने का नाम नहीं ले रहे। क्या नाम जप का फल मुझे अगले जन्म में मिलेगा? इस जन्म में तो कुछ दिखाई नहीं दे रहा।”

महाराज जी मुस्कुराए और बड़े प्रेम से बोले –

“बेटी, बात अगले जन्म की मत करो। नाम जप का फल इसी जन्म में शुरू हो जाता है, बस हम उसे पहचान नहीं पाते।”

फिर महाराज जी ने जो समझाया, वह हर भक्त के लिए अमृत समान है :

  1. प्रारब्ध को कोई नहीं मिटा सकता जो कर्म इस जन्म में भोगने के लिए प्रारब्ध बन चुके हैं, उन्हें भोगना ही पड़ेगा। जैसे तीर कमान से निकल गया तो वापस नहीं आता, वैसे ही प्रारब्ध के कर्म भोगने ही पड़ते हैं। लेकिन नाम जप उस तीर की गति को धीमा कर देता है, उसके प्रभाव को कम कर देता है और सबसे बड़ी बात – उस दुख को सहने की शक्ति देता है। तुम्हें लगता है दुख बहुत है, लेकिन नाम जप न होता तो उससे सौ गुना ज्यादा दुख होता।
  2. संचित कर्मों को भस्म कर देता है नाम हमारे भीतर असंख्य जन्मों के संचित पाप पड़े हैं। वे प्रारब्ध नहीं बने हैं अभी, लेकिन कभी भी प्रारब्ध बन सकते हैं। नाम जप अग्नि की तरह है जो इन संचित पापों को जला कर राख कर देता है। एक-एक पाप जलता है, जिससे आने वाले जन्मों में हमें भयंकर दुख नहीं भोगने पड़ते।
  3. क्रियमाण कर्मों को भी शुद्ध करता है इस जन्म में हम रोज़ नए कर्म करते हैं। उनमें से कई पाप कर्म भी हो जाते हैं – क्रोध में आकर गाली दे दी, ईर्ष्या की, छल किया। ये क्रियमाण कर्म हैं। नाम जप इन क्रियमाण कर्मों को भी पाप बनने से पहले ही नष्ट कर देता है या उन्हें इतना कम कर देता है कि उनका फल नगण्य रह जाता है।
  4. दुख सहने की क्षमता देता है सबसे बड़ा फल यही है कि नाम जप के प्रभाव से मन इतना मजबूत हो जाता है कि बड़े से बड़ा दुख भी सहन हो जाता है। बाहर से देखने वाले को लगता है “बहुत दुख है इसके पास”, लेकिन अंदर से वह भक्त शांत और प्रसन्न रहता है। यह नाम जप का प्रत्यक्ष फल है।
  5. भगवान की प्राप्ति और जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति नाम जप का अंतिम और सबसे बड़ा फल है – स्वयं भगवान की प्राप्ति। जब तक हम भगवान को नहीं पाते, तब तक जन्म-मृत्यु का चक्र चलता रहता है। नाम जप ही एकमात्र साधन है जो इस चक्र को सदा-सदा के लिए तोड़ देता है।

महाराज जी ने हँसते हुए कहा – “यदि तुम नाम जप नहीं करोगे तो इस संसार सागर में डूब जाओगे। नाम जप ही एकमात्र नाव है जो इस भवसागर से पार लगा देती है। बाकी सारे साधन सहायक हैं, लेकिन नाव सिर्फ़ नाम है।”

एक और बार किसी ने पूछा, “महाराज जी, बहुत जप करते हैं, फिर भी मन भटकता है।” महाराज जी बोले – “जितना मन भटके, उतना ही नाम जपो। मन भटकने का मतलब है पुराने संस्कार जाग रहे हैं। नाम जप उन्हें जला रहा है। जैसे आग में लकड़ी डालते जाएँ तो चटक-चटक की आवाज़ आती है, वैसे ही मन में विकार जागते हैं। डरना मत, नाम जपते रहो। एक दिन सारे विकार जल कर राख हो जाएँगे और सिर्फ़ा-कृष्ण ही शेष रह जाएँगे।”

महाराज जी का स्पष्ट मत है – “नाम जप के बिना न इस जन्म का कल्याण है, न अगले जन्म का। नाम जप से बड़ा कोई तप नहीं, कोई यज्ञ नहीं, कोई दान नहीं, कोई तीर्थ नहीं।”

अतः हे भक्तजनों! यदि जीवन में दुख बहुत लग रहे हैं, निराशा घेर रही है, तो एक ही काम करो – दिन-रात राधा-राधा, कृष्ण-कृष्ण, सीता-राम, शिव-शिव, जय जय श्री राधे… जो भी प्रिय नाम हो, उसे जीभ पर रखो। माला फेरो या बिना माला के मन ही मन जपो। रात को सोते समय भी नाम जपते सो जाओ। सुबह उठते ही नाम जपते उठो।

नाम जप का फल निश्चित रूप से इसी जन्म में मिलना शुरू हो जाता है –

  • मन को शांति मिलती है
  • क्रोध, लोभ, ईर्ष्या कम होती है
  • दुख सहने की ताकत आती है
  • संचित पाप जलते हैं
  • और सबसे बड़ी बात – प्रभु का प्रेम जागता है।

और जब एक बार प्रभु का प्रेम जाग गया, तो समझो सारी साधना सफल हो गई। फिर न दुख दुख लगता है, न सुख में मोह रहता है। बस राधा-कृष्ण ही राधा-कृष्ण दिखाई देते हैं।

जय श्री राधे! जय जय श्री राधे!! हरि बोल हरि बोल हरि बोल मेरे भैया, हरि बोल हरि बोल हरि बोल रे।

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