Premanand Maharaj: शादी के कार्ड छपवाने में लोग कर रहे हैं बड़ी भूल, प्रेमानंद महाराज ने किया सावधान, जानिए सही तरीका
Premanand Maharaj: भारत में विवाह केवल एक सामाजिक आयोजन नहीं, बल्कि एक पवित्र संस्कार माना जाता है। शादी-ब्याह के साथ अनेक धार्मिक परंपराएं और रीति-रिवाज जुड़े होते हैं। इन्हीं परंपराओं में से एक है शादी के निमंत्रण पत्र यानी वेडिंग कार्ड छपवाना। वर्षों से यह परंपरा चली आ रही है कि शादी के कार्ड पर भगवान के नाम, मंत्र या देवी-देवताओं की तस्वीरें छपवाई जाती हैं, ताकि विवाह शुभ और मंगलमय हो।
लेकिन वृंदावन-मथुरा के प्रसिद्ध संत पूज्य प्रेमानंद महाराज ने इस प्रथा को लेकर लोगों को चेताया है। उन्होंने बताया कि श्रद्धा के नाम पर की जाने वाली यह परंपरा आज के समय में अनजाने में भगवान के अपमान का कारण बन रही है।
शादी का कार्ड: एक सीमित समय की वस्तु
प्रेमानंद महाराज का कहना है कि शादी का कार्ड कोई स्थायी या पूजनीय वस्तु नहीं है। यह केवल कुछ दिनों या हफ्तों के लिए उपयोग में आता है। विवाह संपन्न होने के बाद अधिकांश लोग इन कार्डों को संभालकर नहीं रखते।
अक्सर देखा जाता है कि:
- शादी खत्म होते ही कार्ड रद्दी में चला जाता है
- कभी कूड़ेदान में फेंक दिया जाता है
- कभी घर के किसी कोने में पड़ा-पड़ा खराब हो जाता है
- कई बार कार्ड पैरों तले आ जाता है
ऐसी स्थिति में यदि कार्ड पर भगवान की तस्वीर या नाम छपा हो, तो यह स्थिति स्वतः ही अनादर की बन जाती है।
भगवान का सम्मान हर स्थिति में आवश्यक
प्रेमानंद महाराज कहते हैं कि भगवान का सम्मान किसी विशेष दिन या अवसर तक सीमित नहीं होना चाहिए। भगवान चाहे नाम के रूप में हों या चित्र के रूप में, उनका सम्मान हर परिस्थिति में समान होना चाहिए।
उन्होंने कहा—
“जिस वस्तु को अंत में कूड़े में फेंकना पड़े, उस पर भगवान की तस्वीर लगाना उचित नहीं है। यह श्रद्धा नहीं, बल्कि अज्ञानता है।”
भारतीय संस्कृति में देवी-देवताओं की तस्वीरों को भी पूजा के योग्य माना गया है। उन्हें पैरों तले आना, फेंक दिया जाना या अपवित्र स्थान पर रखा जाना शास्त्रों में वर्जित माना गया है।
परंपरा कैसे बनी, लेकिन समय के साथ बदली परिस्थितियां
पहले के समय में शादी के कार्ड बहुत सीमित संख्या में छपते थे और लोग उन्हें संभालकर रखते थे। उस समय कार्ड हाथ से लिखे जाते थे या साधारण कागज पर छापे जाते थे। लोग उन्हें श्रद्धा के साथ रखते थे।
लेकिन आज के डिजिटल और तेज़ रफ्तार जीवन में स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है:
- हजारों की संख्या में कार्ड छपते हैं
- लोगों के पास उन्हें संभालकर रखने का समय नहीं
- कार्ड केवल एक औपचारिक सूचना बनकर रह गया है
ऐसे में पुरानी परंपराओं को बिना सोचे-समझे निभाना कई बार धार्मिक विकृति का कारण बन जाता है।
शादी के कार्ड पर क्या होना चाहिए?
प्रेमानंद महाराज ने साफ शब्दों में बताया कि शादी के कार्ड का उद्देश्य केवल सूचना देना है, पूजा कराना नहीं। उनके अनुसार शादी के कार्ड पर सिर्फ यह जानकारी होनी चाहिए:
- दूल्हा और दुल्हन का नाम
- विवाह की तिथि
- विवाह का समय
- विवाह स्थल का पता
- परिवार की ओर से विनम्र निमंत्रण
इससे अधिक धार्मिक चित्र या पवित्र प्रतीकों का उपयोग करने की आवश्यकता नहीं है।
किन तस्वीरों से विशेष रूप से बचना चाहिए?
आजकल लोग कार्ड को आकर्षक बनाने के लिए इन पवित्र छवियों को छपवाते हैं:
भगवान शिव-पार्वती का विवाह रूप
राधा-कृष्ण
श्रीराम-सीता विवाह दृश्य
गणेश जी या अन्य देवी-देवता
प्रेमानंद महाराज कहते हैं कि ये सभी छवियां अत्यंत पवित्र हैं और इनका स्थान मंदिर, पूजा घर या धार्मिक ग्रंथों में है, न कि ऐसे कार्डों पर जिन्हें बाद में फेंक दिया जाएगा।
श्रद्धा और समझदारी का संतुलन जरूरी
महाराज जी ने यह भी स्पष्ट किया कि वे भगवान के नाम या भक्ति के विरोध में नहीं हैं, बल्कि गलत स्थान और गलत तरीके से भक्ति दिखाने के विरोध में हैं।
सच्ची श्रद्धा दिखावा नहीं, बल्कि समझदारी और मर्यादा से जुड़ी होती है। यदि हम सच में भगवान का सम्मान करते हैं, तो हमें यह भी सोचना चाहिए कि हमारी छोटी-सी लापरवाही कहीं बड़े अनादर का कारण तो नहीं बन रही।
समाज में फैलती एक चिंताजनक प्रवृत्ति
प्रेमानंद महाराज ने इसे समाज में फैलती एक धार्मिक विकृति बताया। उन्होंने कहा कि आज हम श्रद्धा से जुड़ी वस्तुओं को भी उपयोग और फेंकने वाली चीजों की तरह इस्तेमाल करने लगे हैं।
जब पवित्र छवियां:
कूड़े में जाती हैं
पैरों तले कुचली जाती हैं
अपवित्र स्थानों पर पड़ी रहती हैं
तो यह हमारी संस्कृति के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
समाधान क्या है?
इस समस्या का समाधान बहुत सरल है:
शादी के कार्ड को सिर्फ सूचना पत्र की तरह देखें
देवी-देवताओं की तस्वीरों का उपयोग न करें
यदि श्रद्धा प्रकट करनी है तो शादी के दिन पूजा-पाठ करें
घर में भगवान की तस्वीरों का सम्मानपूर्वक पूजन करें
इससे न केवल धार्मिक मर्यादा बनी रहेगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी सही संस्कार मिलेंगे।
प्रेमानंद महाराज का संदेश
अंत में प्रेमानंद महाराज ने समाज को यह संदेश दिया कि:
“भगवान का सम्मान दिखावे से नहीं, समझ से होता है। जहां सम्मान निभा न सकें, वहां उनका नाम और चित्र प्रयोग में न लाएं।”
उनकी यह सीख आज के समय में अत्यंत महत्वपूर्ण है, जब परंपराएं बिना सोच-समझ के निभाई जा रही हैं।
निष्कर्ष
शादी जीवन का एक पवित्र संस्कार है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर पवित्र वस्तु को सीमित उपयोग की चीज़ों से जोड़ दिया जाए। प्रेमानंद महाराज की यह सीख हमें यह समझाती है कि सच्ची श्रद्धा तभी सार्थक है जब वह मर्यादा और विवेक के साथ निभाई जाए।
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इसलिए अगली बार जब आप शादी का कार्ड छपवाएं, तो इसे केवल एक निमंत्रण पत्र रखें, न कि पूजा का माध्यम। यही भगवान के प्रति सच्चा सम्मान है।
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